सृजन के बीज

feminist poems नये साल की पूर्व संध्या पर वर्ष की अन्तिम पोस्ट ) तुझमें जो आग है उस आग को तू जलने दे अपने सीने में उसे धीरे-धीरे पलने दे... भभक कर जलेगी तो राख बन जायेगी धुयें के साथ यूँ ही आप से सुलगने दे... उस पर आँसू न बहा अश्क के छींटे मत दे न अपने दिल को इस आग... [पूरी पोस्ट]
writer mukti
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[28 Dec 2009 13:12 PM]

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