अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-2

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने दौर आज का उल्टा-पुल्टा , उल्टा बहे समीर | रांझा आवारा फिरे , हुई बेवफा हीर || रक्षक ही भक्षक बनें , किसे सुनाएँ पीर | कुछ घर में भूखे मरे , गटक रहे कुछ खीर || खा लो जितना भी मिलें , राखो मन में धीर | उतना ही मिलता यहाँ , जितना है तकदीर || मँहगी रोटी... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[28 Dec 2009 10:13 AM]

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