कुछ बिखरे लफ्ज़ (क्षणिकाएँ...)
वक़्त. क्यों तुम्हारे साथ बिताई हर शाम मुझे आखिरी-सी लगती है जैसे वक़्त काँच के घर को पत्थर दिखाता है !! हरसिंगार लरजते अमलतास ने खिलते हरसिंगार से ना जाने क्या कह दिया बिखर गया है ज़मीन पर उसका एक-एक फूल जैसे किसी गोरी का मुखड़ा सफ़ेद हो के गुलाबी-सा...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[28 Dec 2009 07:40 AM]



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