इस जमाने के अन्दर तो जमाने बहुत हैं

यादों का इन्द्रजाल... Hindi Poetry by Sulabh अनजान शहर में मिले खजाने बहुत हैं खेल किस्मत को अभी दिखाने बहुत हैं हर कदम टूटते हैं सैकडो दिल यहाँ टूटे बिखरे दिलों के अफ़साने बहुत हैं कुर्सी के पिछे दौड़कर सभी बावले हुए इक नाजनीन के देखो दीवाने बहुत हैं नक़ाब बदल बदल कर जो करते हैं घात उनको ढुढें... [पूरी पोस्ट]
writer सुलभ सतरंगी

ग़ज़ल

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[28 Dec 2009 07:19 AM]

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