मिर्ज़ा ग़ालिब जी के कुछ शेर

मिर्ज़ा ग़ालिब मशहदे-आशिक़ से कोसों तक जो उगती है हिना, किस क़दर यारब ! हलाके-हसरते-पाबोस था । * मशहदे-आशिक़ = प्रेमी की बलिवेदी, हलाके-हसरते-पाबोस = पाँव चूमने की कामना का मारा हुआ अर्थात "जिस जगह प्रेमी का रक्त बहा वहाँ कोसों तक मेहँदी उगती है । क्यों ? इसलिए कि ज... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :
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[28 Dec 2009 03:32 AM]

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