जिसकी शाखें परिंदों के गाने सुनें

नीरज सुधि पाठको प्रस्तुत है इस वर्ष की अंतिम ग़ज़ल " नव वर्ष की ढेरों शुभकामनाओं सहित" उलझनें उलझनें उलझनें उलझनें कुछ वो चुनती हमें,कुछ को हम खुद चुनें जो नचाती हमें थीं भुला सारे ग़म याद करते ही तुझको बजी वो धुनें पूछिये मत ख़ुशी आप उस पेड़ की जिसकी शाख... [पूरी पोस्ट]
writer नीरज गोस्वामी
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[27 Dec 2009 23:50 PM]

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