क्या भूलूं क्या याद रहा है
दोछत्ती पर रखी हुई थी एक टोकरी यादों वाली आज सफ़ाई करते करत झाडन उसको जरा छू गया बीते हुए दिवस तितली ब सजे कक्ष की दीवारों पर कल का खर्च हुआ हर इक पल फिर से संचित आज हो गया और लगे नयनों में तिरने बरगद,पीपल, वे चौपालें वे बिसायती वे परचूनी औ; लकड़ी कोयल...
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राकेश खंडेलवाल
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[27 Dec 2009 21:07 PM]



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