टौफियाँ, कुल्फियाँ, कौफी के जायके...

पाल ले इक रोग नादां जिंदगी के वास्ते... कुछ टिप्पणियाँ वाकई संवाद के नये रास्ते खोलती हैं। अभी पिछली पोस्ट पर जो अपनी ग़ज़ल सुनायी थी आपलोगों को मैंने, उस पर वाणी जी की एक टिप्पणी ने मन को छू लिया। उन्होंने लिखा था - "एक काम्प्लेक्स सा आ जाता है ...कहाँ हम वही काल्पनिक प्रेम वीथियों में अटके... [पूरी पोस्ट]
writer गौतम राजरिशी

बहरे मुतदारिक

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[27 Dec 2009 20:36 PM]

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