जाने किसकी नज़्म है ये... पर बेहद ख़ूबसूरत है....
मुझको मेरे ही खेत में धरती उतार दे मैं धान बोऊँ और तू पानी उतार दे पानी बढ़ गया है छतें भी अब हैं ज़मीन छज्जे पर धूप की कोई कश्ती उतार दे तू अपने घर में बिखरी हुई खुशबुएँ पहन अब ये लिबास-ए-खानाबदोशी उतार दे खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ चिड़िया ये...
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नीरज
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[27 Dec 2009 15:08 PM]



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