लकीरों से अब उतर भी जायेगा...!
आदाब..... एक ताज़ा ग़ज़ल बहर-ए-रमाल मुसद्दस महजूफ मे आपकी नज़र कर रहा हूँ... जैसा लगे ज़ाहिर कर दीजियेगा...ज्यादा कहा नहीं जाता... ======================= बहर :- रमाल मुसद्दस महजूफ (Faa-i -laa-tun Faa-i-laa -tun Faa-i-lun)(2122 2122 212 – In Digit) =...
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Kunaal
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[27 Dec 2009 14:35 PM]



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