पल्लू में चांदनी
कल रात देर तक /सितारों के ठहाके गूंजते रहे चांदनी ,जो तुमने अपने पल्लू में बाँध रखी थी मेरे पैरो पर सर रखी तुम /ये सच जानती थी मगर मैं नावाफिक था ! मुझे पागल बना देने वाली तुम्हारी हंसी तुम्हारे हाथों की आइसक्रीम की तरह पिघल रही थी और मैं ठिठुर रहा थ...
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आवेश
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[27 Dec 2009 12:01 PM]



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