मेरा मन
मेरा मन बांच रही थी रात चांदनी जब मेरी आँखे और मेरा मन. पूनम के नयनों से भी छलके थे कुछ सुधा सने हिम कण. उस क्षण मौन थी भाषा, मौन थे शब्द, शब्द शक्तियां मचल रहीं थीं अंतर अन्दर बिफर रही थी सांसें तन से छूट रहीं थीं...
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रचना दीक्षित
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[27 Dec 2009 07:20 AM]



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