अंधेरे और उजालो के बीच
दरखतों के बीच सेगुजरता जब कोई परिंदाधूप और बैसाख कीपरवाह किए बिनाहर शाख बुनती तब एक घरौंदादूधिया, धवल याफिर हो सुआपंखीहर रंग में लुभाती जिन्दगीदाना - दाना खानेलिए अधखुली चौंचेहर दम करती मानो बंदगीपीन पंख फड़फड़ाएंउड़ने को जी चाहेहर मंजिल अनजानी, है नई ड...
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Vimla Bhandari
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[27 Dec 2009 03:43 AM]



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