क्यूँ ?
आदमी हो, आदमी को, छलते कयूँ हो ? दूसरों के सर रख के पाँव चलते क्यूँ हो ? शोक ही शक्सियत का, ताज है आखिर , बेगाने वज़ूद पे , नाहक जलते कयूँ हो ? आदतों पे हो के कुर्बां, आदम मसीहा बने , सूरज से क्या सवाल, कि ढ़लते कयूँ हो ? आना जाना ही तो, हर शय का उसू...
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sanjeev kuralia
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[27 Dec 2009 00:28 AM]



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