ग़ज़ल
रात इक ख़्वाब ने , फिर हमको जगाया रात भर ! सिसकियाँ बन के, तमाशाई ने हंसाया रात भर !! दे गया ज़हन को , यूँ बिछड़ी हुयी यादों का भंवर , मैं ढूंढ़ता ही रह गया , ना लौट के आया रात भर ! ये तो तय है कोई, अपना ही था जगाने वाला , ना जाने कितनी ही ,शक्लों से म...
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sanjeev kuralia
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[24 Dec 2009 22:17 PM]



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