मृत्यु और कवि

मुक्तिबोध घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती, जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला, वधू मूर्छि... [पूरी पोस्ट]
writer रंगनाथ सिंह
views
22
upvote
3
downvote
0
rating
3
comments
5
[26 Dec 2009 04:05 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix