हम सब डटे रहेंगे यहीं इसी धरती पर साथी

ख्वाब का दर में सैनिक तानाशाही ने बर्मा में लोकतंत्र को कुचल दिया। इसका मुखर विरोध छात्रों और नौजवानों ने किया। आज तक इस देश में सैनिक तानाशाहों का लौह-शिकंजा सीधी-सादी जनता को लहूलुहान कर रहा है। 1988 के जन उभार के ज्यादातर नायक आज भी जेल में बंद हैं, जो देश की... [पूरी पोस्ट]
writer Pankaj Parashar
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[26 Dec 2009 03:54 AM]

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