ब्लॉग्गिंग की सालगिरह (पुनरावलोकन) - 4
ग़ज़ल-२ ५ दुर्योधन है , ओसामा है , कंस कभी कहलाता है , रंगमंच का पात्र वही है रूप बदल सा जाता है . मन है एक पखेरू, जिसको तर्क यही समझाता है, सात समुन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है, आने वाला बीत गया, 'कल-का-पल' भी कल, 'कल' होगा, इस क्ष...
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[26 Dec 2009 00:30 AM]



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