एक अकेली मैं हूँ और साथ मेरे मेरी तन्हाई

PRAKAMYA एक अकेली मैं हूँ और साथ मेरे मेरी तन्हाई रात घिरी निस्तब्ध मगर मुझे नींद ना आई दिलो को चीरते हैं खामोशियों के पसरे सन्नाटे खोया खोया चाँद भी गुमसुम ख़ामोशी छाई ! आ जाए जो मुझे नीदं तो शायद आयें मीठे सपने सपने में ही गर आ जाओ कभी तो मेरे अपने तारों भरी... [पूरी पोस्ट]
writer आकांक्षा गर्ग
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[25 Dec 2009 04:14 AM]

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