जब हो जाये दिवसान्त शान्त (गीतांजलि का भावानुवाद )
ज ब हो जाये दिवसान्त शान्त हो विहग काकली छन्द प्रभो अठखेली करते मारुत की हो जाय गिरा श्लथ मन्द प्रभो जब अखिल धरित्री निद्रा के अम्बर में लिपटी लेटी हो नत शिर मृदु सरसिज पंखुड़ियाँ मुद्रित दृग धुन्ध लपेटी हों । तब देना गहन तिमिर अंचल मेरे आनन पर खींच प...
[पूरी पोस्ट]
हिमांशु । Himanshu
19
0
0
0
5
[24 Dec 2009 09:04 AM]



Shuffle








