खुद भ्रम में है आईना यहाँ
है ज़हर पर मानकर अमृत उसे पीना यहाँ; ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की ही तरह जीना यहाँ। उन हवाओं को वसीयत सौंप दी है वक्त ने, जिनने खुलकर साँस लेने का भी हक छीना यहाँ। आँख में रखना नमी कुछ और होठों पर हँसी, क्या पता पत्थर बने कब फूल सा सीना यहाँ। हो गया बेहद...
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chandrabhan bhardwaj
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[24 Dec 2009 02:10 AM]



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