मैं अकेला तो नहीं?

एकोऽहम् जीवन में सब कुछ प्रिय और मनोनुकूल नहीं होता। आपका नियन्त्रण केवल आप पर ही होता है, अन्य पर नहीं। ऐसे में, आप कितने ही ‘समय-पालनकर्ता’ हों, दूसरे भी वैसे ही हों, यह अपेक्षा और आग्रह ही कर सकते हैं। इससे अधिक कुछ भी नहीं। किन्तु अपेक्षा तो दुःखों का मू... [पूरी पोस्ट]
writer विष्णु बैरागी

जीवन की पाठशाला

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[23 Dec 2009 21:42 PM]

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