शब्दों से सहवास मियां ........

योगेंद्र मौदगिल उन सब ने खंडित कर डाला जिन पर था विश्वास मियां क्या अपनों कोधर के चाटे क्या अपनों की आस मियां इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना बड़ी घिनौनी लगती है रे आदम की बू-बास मियां रोज-रोज का खून-खराबा रोज-रोज की दहशत से दिन पर दिन घटता जाता है जीवन का... [पूरी पोस्ट]
writer योगेन्द्र मौदगिल

ग़ज़ल

views
43
upvote
6
downvote
0
rating
6
comments
25
[23 Dec 2009 19:08 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix