शब्दों से सहवास मियां ........
उन सब ने खंडित कर डाला जिन पर था विश्वास मियां क्या अपनों कोधर के चाटे क्या अपनों की आस मियां इस बस्ती से आते-जाते नाक पे कपड़ा रख लेना बड़ी घिनौनी लगती है रे आदम की बू-बास मियां रोज-रोज का खून-खराबा रोज-रोज की दहशत से दिन पर दिन घटता जाता है जीवन का...
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योगेन्द्र मौदगिल
ग़ज़ल
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[23 Dec 2009 19:08 PM]



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