कुपोषण
रीढ से चिपके पिचके पेट लिये, कंकाल हो गये चमडी चढे शरीर वाले इन बच्चों की आंखों के आंसू भी सूख कर गीजड बन चुके हैं, जिन पर भिनभिनाती मक्खियों को तो उनका भोजन मिल जाता है किंतु भूख की आग में दहन हो रहे इन नन्हे भविष्यों को एक दाना तक मुहाल नहीं है। इन...
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अमिताभ श्रीवास्तव
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[23 Dec 2009 15:14 PM]



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