रातों को क्या फ़िर बातें किया करेंगे हम ! !
देह के बाहर जाकर एक बेचैनी चहलकदमी करती है देर रात तक, शरीर में जरा दम सा घुटता है बाहर बरामदे में बिना बांह वाली एक कुर्सी है जिस पे वो बैठ जाती है जरा-जरा देर चल कर वहां एक सिगरेट लेने लगती है धुंआ अपने भीतर शरीर से खींच-खींच कर अन्दर धुंआ है अभी भ...
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ओम आर्य
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[23 Dec 2009 11:08 AM]



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