अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-1

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने पल्स पोलियो की तरह,खूब चला अभियान, घर घर चन्दा माँगने, चल देते श्रीमान, मंदिर के निर्माण में,लगा दिए जी-जान, त्याग के गुलछर्रे देखो,वो माँग रहे हैं दान, भारत की भावी पीढ़ी,खुद से है अंजान, चौराहे पर हा-हा,ही-ही, यही बनी पहचान, घर में बीवी लतियाए,बाहर... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[23 Dec 2009 09:53 AM]

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