अहर्निश
मैं जानता हूँ कुछ फर्क नहीं पड़ता मेरे चीखने से, चिल्लाने से, जीवन के शतरंज पर शब्दों की गोटियाँ चराने से। कुछ भी तो फर्क नहीं पड़ता, जलती क्षुधाओं को बेबस आँसुओं को कलपते तन-मन को शब्दों की चाशनी में पकाने से। मैं यह भी जानता हूँ कि जो उबलता है अन्द...
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प्रताप नारायण सिंह
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[23 Dec 2009 02:51 AM]



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