इंशाजी उठो अब कूच करो
इंशाजी उठो अब कूच करो, इस शहर में जी का लगाना क्या वहशी को सुकूं से क्या मतलब, जोगी का नगर में ठिकाना क्या इस दिल के दरीदा दामन में देखो तो सही, सोचो तो सही जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली को फैलाना क्या शब बीती चाँद भी डूब चला ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े पे...
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राकेश त्रिपाठी
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[23 Dec 2009 01:38 AM]



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