स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल'

पिताजी स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल' * स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग... * पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन. मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन.. चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग... * ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान. शत वन... [पूरी पोस्ट]
writer आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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[22 Dec 2009 23:13 PM]

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