तनहाई के राज़दार..4

मैनें आहुति बनकर देखा.. पहली ख़ता- स्वप्न (..आगे) सुगंध याद है मुझे अब भी-वो रुत, वो फिज़ा, जब हम पहली बार मिले थे; नरम जाड़ों के दिन थे वे, और अचानक चलने लगी वो पुरवाई समेट लाती थी अपने आँचल में तरह तरह की खुश-बूएं याद है मुझे अब भी- जब पहली बार मेरे कानों में गूँजी थी तुम... [पूरी पोस्ट]
writer कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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[22 Dec 2009 18:34 PM]

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