" एक तर्जुमा मेरा भी "

एक नीड़ ख्वाबों, ख्यालों और ख्वाहिशों का लखनऊ की तंग गलियों से गुज़रते हुए दो शोहदों को अदब से लड़ते देखा जब तो उनकी इस तकरार पर प्यार आ गया। उनका तर्जुमा कितना सच्चा रवाँ रवाँ सा था वरना इस जहाँ में सच तो सिर्फ़ एक लफ्ज़ है और झूठ कारोबार, एक खोखली बुनियाद के साथ। शायद ! इसी वजह से हर साल.... [पूरी पोस्ट]
writer Priya

आधा सच - आधी सोच

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[22 Dec 2009 11:40 AM]

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