नज़्म और रूह !
कभी फुर्सत हो तो आना करनी हैं कुछ बातें जानना है कैसी होती है नज्मों की रातें..... कैसे कोई नज़्म रूह बन जाती है और पूरे दिन,रात की सलवटों में कैद हो जाती है ! पूरा दिन ना सही एक पल ही काफी है प्यार को पढ़ने के लिए नज़्म से रूह रूह से नज़्म में बदलने...
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रश्मि प्रभा...
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[22 Dec 2009 06:12 AM]



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