स्मृति दीर्घा: --संजीव 'सलिल'
स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल' * स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग... * पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन. मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन.. चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग... * ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान. शत वन...
[पूरी पोस्ट]
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
21
0
0
0
1
[21 Dec 2009 23:45 PM]



Shuffle








