ब्लॉग्गिंग की सालगिरह (पूर्वावलोकन) -3

प्राची व उसके पार... ग़ज़ल-१  १   अब मुसाफिर जग गया तो, सो रही हैं मंजिलें, लौट के आती नहीं हैं, खो रही हैं मंजिलें। इक सफ़र है ज़िन्दगी औ, मौत उसका अंत है, दूर अब इतनी नहीं, बस, वो रही हैं मंजिलें। याद है अब भी मुझे इन, मंजिलों का रूठना, लो गले लग के मेरे... [पूरी पोस्ट]
writer दर्शन
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[21 Dec 2009 07:32 AM]

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