एक कोशिश
कुछ परवाजों को पंख नही मिला करते कुछ दरख्तों पर फूल नही खिला करते अब तो कलमों की स्याही भी सूख चुकी है कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ? कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ? यादों का उधड़ना अभी बाकी है लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया तो...
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वन्दना
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[21 Dec 2009 07:25 AM]



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