शौचालय और बेसुध मैं

खुली खिड़की मुझे वो दिन कभी नहीं भूलता। उस दिन मैं काम कर कर बेसुध हो चुका था। मेरा शरीर गतीविधि कर रहा था, जबकि मेरा दिमाग बिल्कुल सुन्न हो चुका था, क्योंकि काम कर कर दिमाग इतना थक चूका था कि उसमें और काम करने की हिम्मत न थी। मैंने अपनी कुर्सी छोड़ी, और टहलने के... [पूरी पोस्ट]
writer Kulwant Happy

शौचालय

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[20 Dec 2009 22:09 PM]

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