विरह
अमूमन प्रेम की समिधायें विरह के अग्निकुंड में अर्पित होते देखी हैं। सदियां बीत गई कभी किसी अग्निदेव को प्रकट होते नहीं देखा, न ही देखा प्रेम का यौवन लौटते हुए, न उसे किसी वरदान से दमकते हुए। हां, देखा तो बस 'स्वाहा' का उच्चारण करते हुए निच्छल हृदयों...
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अमिताभ श्रीवास्तव
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[20 Dec 2009 14:17 PM]



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