अवधी उपन्यास - क़ासिद (11)
दादी चाय क कप लैइके बिल्कुल नेरे आ गईं तबहिनौ शुक्लाजी का पता नाई चला। ऊ पता नाईं टीवी म का देखि क बस मुस्कुरवतै रहे। दादी चाय क कप नेरे याक स्टूल पर धरि दीन्हेनि। “ का बात है बच्चा ? का देखि क मुस्कुरा रह्यौ ?” शुक्लाजी शायद अबहिनौ अपनी अम्मा केरि ब...
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पंकज शुक्ल
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[20 Dec 2009 11:01 AM]



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