मेरे बोलों को तुम अपनी रवानी दे दो !!!

मेरे बोलों को तुम अपनी रवानी दे दो !!! होने दो सागर का मंथन विष निकलेगा- यह भय क्यों हो क्यों हो क्रंदन- पाना तुमको यदि अमृत है मंथन तो करना ही होगा छोड़ रहे क्यों मध्य मार्ग में यात्रा को पूरा करना है थकित रहे तन तो क्या डर है मन तो थका नहीं करता है उठो करो तुम शक़्ति प्रदर्शन होने दो सा... [पूरी पोस्ट]
writer Anurag Srivastava
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[20 Dec 2009 02:30 AM]

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