आज प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता "याद उसकी"

Kavi Sammelan जहाँ तक दीठ जाती है फैली हैं नंगी तलैटियाँ एक - एक कर सूख गये हैं नाले , नौले और सोते कुछ भूख , कुछ अज्ञान और कुछ लोभ में अपनी संपदा हम रहे हैं खोते ज़िन्दगी में जो रहा नहीं , याद उसकी बिसूरते लोकगीतों में कहाँ तक रहेंगे संजोते ? रचयिता : अज्ञेय प्रस्... [पूरी पोस्ट]
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[19 Dec 2009 20:26 PM]

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