जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

मेरी ग़ज़लें, मेरे गीत/प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ। मैं तो केवल इतना सोचूँ। बालिग होकर ये मुश्किल है, आओ खुद को बच्चा सोचूँ। सोच रहे हैं सब पैसों की, लेकिन मैं तो दिल का सोचूँ। बातों की तलवार चलाए, कैसे उसको अपना सोचूँ। ऊपर वाला भी कुछ सोचे, मैं ही क्योंकर अपना सोचूँ। जो भी हो... [पूरी पोस्ट]
writer प्रसन्न वदन चतुर्वेदी
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[19 Dec 2009 12:39 PM]

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