3-जहरीली हवा

सहज साहित्य(SAHAJ SAHITYA) रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' आँख खुली। किशोर हड़बड़ाकर उठ बैठा। गला सूख रहा था। पानी पीकर थोड़ी राहत मिली। हाशिम गहरी नींद सोया हुआ था। उसे भयंकर सपने पर हैरत हुई। सपने उसे कभी – कभार ही आते हैं पर इस तरह का सपना तो कभी नहीं आता। पूरा शहर पागलपन की आ... [पूरी पोस्ट]
writer सहज साहित्य
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[19 Dec 2009 12:30 PM]

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