मैं थक गया हूं, ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़े
मैं थक गया हूं ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़े करना कुछ चाहता हूं करना कुछ पड़ता है वरना लोग कहेंगे देखो, कैसा जंगली है लेकिन बहुत हुआ मुझे अब परवाह नहीं किसी की मैं सच कह रहा हूं नोंच के फेंक दूंगा इसे क्यूंकि मैं थक गया हूं ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़...
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[29 Jul 2009 09:32 AM]



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