एक कचोटती ग़ज़ल
हैरत में हैं लोग सचबयानी देखकर दो गवाह और झूटी कहानी देखकर लिख सजा बेगुनाह को कलम है शर्मशार फैसले हुए हैं कागज़ कानूनी देखकर ख्वाहिशों कि उड़ान अभी बाकी है बहुत मियाँ घबरा गए ढलती जवानी देखकर जाने क्या देखकर जाने क्या सोचकर फूल मुरझा गए सख्त निगरानी द...
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सुलभ सतरंगी
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[19 Dec 2009 01:08 AM]



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