रूप से स्निग्ध हुई प्रकृति और जीवन के एकाकार क्षण
रूप से स्निग्ध हुई प्रकृति और जीवन के एकाकार क्षण मैंने ५ अक्टूबर को जब भीतर बरसात न हो तो इनकी लिपटन सुहाती ही है में लिखा था - रात-भर बरखा हुई......
पर रात को तो लिखते हुए मैं देर तक जग ही रही थी, बिना आहट टिम टिम बुदकी-सी फुहार गिरी जान पड़ती है |...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[18 Dec 2009 13:50 PM]



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