मत्स्य

रजनीगन्धा रात का आखिरी पहर जब और गाढ़ा हो, जब हाथ को हाथ न सूझे, अंधेरे में मुट्ठी भर शब्द मोगरे की तरह महक उठे, अंधेरे की रेशमी तह चूम कर बलैयां लेती रहें, तुम सिरहाने बैठ कर शांत, निर्लिप्त, विरक्त समुद्र में नौका खेते रहो और, मैं फेनल से भीगी मत्स्य अर्जित क... [पूरी पोस्ट]
writer रजनी भार्गव
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[18 Dec 2009 11:47 AM]

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