जुस्तज़ू
जुस्तज़ू " जो प्यार मैं करूँ कैसे बगावत करूँ कैसे न उसकी अब मैं इबादत करूँ क्या खता थी मेरी मुझे नहीं है पता किससे शिकवा करूँ क्या शिकायत लब सिले हैं मेरे पर पशेमाँ भी हैं कैसे इज़हार करूँ न शिकायत करूँ जुस्तज़ू थी मेरी जो मुझे मिल गई इक कसक आबरू की ह...
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Kusum Thakur
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[18 Dec 2009 10:57 AM]



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