कोई सपना पलक पर बसा ही नहीं
जाने क्या हो गया है पता ही नहीं; कोई सपना पलक पर बसा ही नहीं। नापते हैं वो रिश्तों की गहराइयाँ, जिनकी आंखों में पानी बचा ही नहीं। उनको मालूम क्या दर्द क्या चीज है, जिनके पाँवों में काँटा गड़ा ही नहीं। टूट जाने का अहसास होता कहाँ, प्यार की डोर में जब...
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chandrabhan bhardwaj
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[18 Dec 2009 04:45 AM]



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