मर्दिता
एकालाप मर्दिता बहुत मार खाई मैंने तुम्हारे लिए ,
तुम्हारे प्यार के लिए. मैंने सपने देखे ,
तुम्हें अपना माना और बहुत मार खाई पिता के हाथों,
समाज के हाथों भी :
भला यह भी कोई बात हुई कि औरत सपने देखे कि औरत प्यार करे कि औरत इज़हार करे! मेरा अंग अंग रोता...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[17 Dec 2009 20:38 PM]



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