पर... ... माँ

feminist poems ग़लती करती तो डाँट खाती दीदी से भी और बाबूजी से भी सब सह लेती पर सह न पाती माँ तुम्हारा एक बार गुस्से से आँखें तरेरना .......................... कई तरह की सज़ाएँ पायीं मार भी खायी कई बार पर नहीं भूलती माँ तुम्हारी वो अनोखी सज़ा कुछ भी न कहना सभी काम... [पूरी पोस्ट]
writer mukti
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[17 Dec 2009 14:15 PM]

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